खेल दिवस : अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय हॉकी क्या कर पायेगी टोक्यो ओलंपिक में कोई चमत्कार

लखनऊ। एक समय था जब भारतीय हॉकी का जलवा पूरे विश्व में देखने को मिलता था। ओलम्पिक जैसी बड़ी प्रतियोगिताओं में भारतीय हॉकी टीम स्वर्ण जीतकर भारत का परचम बुलंद किया करती थी लेकिन फिलहाल भारतीय हॉकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दम तोड़ चुका है। इस समय भारतीय हॉकी ओलपिंक स्तर के खेलों में संघर्ष करती नजर आ रही है।

बात अगर अतीत की जाये तो आजादी मिलने से 11 साल पहले यानी 15 अगस्त का दिन भारतीय हॉकी के लिए बेहद यादगार रहा है। दरअसल इस दिन भारतीय हॉकी ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए बर्लिन ओलंपिक फाइनल में जर्मनी को हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया था।

दद्दा ध्यानचंद की जयन्ती पर  मनाया जाता है राष्ट्रीय खेल दिवस

इतना ही नहीं हिटलर की मौजूदगी में 15 अगस्त को हॉकी जादूगार माने जाने वाले मेजर ध्यानचंद ने भारत का परचम लहराया था। दद्दा ध्यानचंद की जयन्ती के अवसर पर राष्ट्रीय खेल दिवस आज 29 अगस्त को मनाया जाता है। इस दिन देश के उत्कृष्ट प्लेयर्स को राष्ट्रीय खेल पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया जाता है।

भारत की इस ऐतिहासिक जीत के बाद जर्मनी के तत्कालीन तानाशाह एडोल्फ हिटलर स्वयं मेजर ध्यानचंद के खेल से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने ध्यानचंद को जर्मन नागरिकता का प्रस्ताव भी दे डाला था।

आजादी से पहले का 15 अगस्त हॉकी के लिए एक यादगार लम्हा

ध्यानचंद के बेटे और 1975 विश्व कप में भारत की खिताबी जीत के नायकों में शुमार अशोक कुमार के अनुसार उनके पिता जी(मेजर ध्यानचंद)उस दिन को कभी नहीं भूले और जब भी हॉकी की बात होती तो वह उस ओलंपिक फाइनल का जिक्र जरूर करते थे। समुद्र के रास्ते लंबा सफर तय करके भारतीय हॉकी टीम हंगरी के खिलाफ पहले मैच से दो सप्ताह पहले बर्लिन पहुंची थी लेकिन अभ्यास मैच में जर्मन एकादश से 4-1 से हार गई।

मेजर ध्यानचंद के खेल ने दिलाया था स्वर्ण पदक

पिछले दो बार की चैम्पियन भारत ने टूर्नामेंट में लय पकड़ते हुए सेमीफाइनल में फ्रांस को 1०-० से हराया जिसमें मेजर ध्यानचंद ने चार गोल दागे। फाइनल में जर्मन डिफेंडरों ने मेजर ध्यानचंद पर विशेष नजर रखते हुए उन्हें चारों ओर से घेरे रखा था जिससे जर्मन गोलकीपर टिटो वार्नहोल्ज से टकराकर उनका दांत भी टूट गया।

ब्रेक में उन्होंने और उनके भाई रूप सिंह ने मैदान में फिसलने के डर से जूते उतार दिये और नंगे पैर खेले। ध्यानचंद ने तीन और रूप सिंह ने दो गोल करके भारत को 8-1 से जीत दिलाई। अशोक ने बताया कि उस मैच से पहले की रात उन्होंने कमरे में खिलाडिय़ों को इकट्ठा करके तिरंगे की शपथ दिलाई थी कि हमें हर हाल में यह फाइनल मैच जीतना है।

उस समय भारत ब्रिटिश झंडे तले ही खेल रहा था। उस दौर में भारतीय हॉकी लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रही थी लेकिन अखबारों में उन दिनों भारतीय आजादी की चर्चा और आंदोलन की चर्चा ज्यादा होती थी। हालांकि भारतीय हॉकी को लेकर उस वक्त की मीडिया में खूब चर्चा होती थी।

अशोक बताते है कि उस दौर में टीम दान के जरिये एकत्र किए गए पैसों के दम पर ओलंपिक खेलने गई थी। उस समय जर्मनी एक मजबूत टीम मानी जाती थी लिहाजा उवसको हराना इतना आसान नहीं था लेकिन भारतीय हॉकी एक अलग टीम बनकर सामने आई थी। उन्होंने बताया कि 15 अगस्त 1936 के ओलंपिक मैच के बाद खिलाड़ी वहां बसे भारतीय समुदाय के साथ जश्न मना रहे थे लेकिन ध्यानचंद कहीं नजर नहीं आ रहे थे।

अशोक ने कहा कि हर कोई उन्हें तलाश रहा था और वह उस स्थान पर उदास बैठे थे जहां तमाम देशों के ध्वज लहरा रहे थे। उनसे पूछा गया कि वह यहां उदास क्यों बैठे हैं तो उन्होंने इसका जवाब देते हुए कहा था कि काश हम यूनियन जैक की बजाय तिरंगे तले जीते होते और हमारा अपना तिरंगा यहां लहरा रहा होता। वह मेजर ध्यानचंद का आखिरी ओलंपिक था।

इन दिनों देखा जाए तो मौजूदा दौर में भारतीय हॉकी पहले जैसी नहीं रही। इतना ही नहीं कई मौकों पर भारतीय हॉकी को संघर्ष भी करना पड़ा। एक वक्त ऐसा भी आया था जब भारतीय हॉकी को ओलम्पिक में क्वालीफाई करना मुश्किल हो रहा था। विवाद और गिरते खेल के स्तर की वजह से भारतीय हॉकी एकाएक कमजोर होती चली गई थी। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय हॉकी आगामी टोक्यो ओलम्पिक मेें कैसा प्रदर्शन करती है।

 

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